क्योंकि घर वाले समझते नहीं, कभी कभी बस चुप रहना पड़ता है, जैसे ये सब समझाने में कोई फायदा नहीं, मेरा मन करता है कुछ और करना पर कोई नहीं पूछता, समझेगा कौन।
जब मैं 25 साल का था, तो मैंने एक अजनबी को छोटी सी मदद करने के लिए अपनी किस्मत आजमाई थी, और वह मौका हमेशा मेरे मन में एक कसक की तरह रहा। अब सोचता हूँ, क्यों नहीं कर पाया कुछ और बड़ा, वो छोटे छोटे अच्छे काम कभी बड़े बदलाव में नहीं बदलते।
हर सुबह उठती हूँ और सोचती हूँ कि किसी ने भी कभी मेरी तस्वीर नहीं देखी, कभी मुझे प्यार से नहीं देखा. ये लग रहा है जैसे मैं ज़िंदगी की किसी झील में खड़ी हूँ और सब तैर के निकल गए.
हर सुबह उठती हूँ और सोचती हूँ कि किसी ने भी कभी मेरी तस्वीर नहीं देखी, कभी मुझे प्यार से नहीं देखा. ये लग रहा है जैसे मैं ज़िंदगी की किसी झील में खड़ी हूँ और सब तैर के निकल गए.
yaar, matlab samjho na, went to buy a simple broom and came out with a mop instead, like how does that even happen? अब सब कुछ ठीक है पर घर में सारा दिन झाड़ू करने का मूड नहीं है, seriously, मेरी तो समझ में नहीं आता।